Wednesday, 3 August 2011

गाँव सुहाना..

वो टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डी, वो कच्चे पक्के रस्ते.
वो धन की गेंहू की फसलें, वो चेहरे रोते हँसते.
वो सुबह-सुबह मिट्टी के घर से उठती सोंधी गंध.
वो जलते चूल्हे के धुंए से छाता सा एक धुंध.
वो नीम की ठंडी-ठंडी छाँव, वो खेलना छुपन-छुपाई.
वो छुपना पुआल के गल्ले में, वो पूछना 'मुनिया आई?'.
वो दरवाजे पर बैठी बुढ़िया को दिन-रात सताना.
वो सुनना ढेरों गलियाँ उससे गली में फिर छुप जाना.
वो तोड़ना आम बगीचों से वो गिरना और गिराना.
वो लालटेन की रौशनी तले किताबें खोले सो जाना.
वो नींद में खाना दूध-रोटी, फिर सपनों में खो जाना.
खुद आज हो गया एक सपना बचपन और गाँव सुहाना....
                                                            - ज्योति.

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